ज़ख्म पे ज़ख्म लगाए गए मंजर मुझको,
वो मिला भी तो होकर किसी और का मुझको.....
कोई आवाज़ ना कोई अहसास ना क़दमों के निशां,
जिंदगी ने कहाँ फेंका है उठाकर मुझको....
अपने टूटे हुए ख्वाबों को दफना दूं...
फिर ना जाने ले जाए कहाँ मुक्क़द्दर मुझको....
नींद के बोझ से उजड़ी हुयी आँखों कि कसम,
रातभर ग़म में जलाता रहा बिस्तर मुझको.....
ऐ खुदा ऐसी सजा कभी किसी को ना देना.....
मकबरे कि तरह लगता है मेरा ये घर मुझको....
एक एक ज़ख्म वही याद दिलाते है .....
अब तो चाहत से भी लगता है बड़ा डर मुझको....
नींद के बोझ से उजड़ी हुयी आँखों कि कसम, रातभर ग़म में जलाता रहा बिस्तर मुझको..... accha hai
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