Saturday, 27 November 2010


प्यास वो दिल की बुझाने कभी आया भी नहीं
कैसा बादल है जिसका कोई साया भी नहीं
बेरुख़ी इससे बड़ी और भला क्या होगी
एक मुद्दत से हमें उस ने सताया भी नहीं
रोज़ आता है दर-ए-दिल पे वो दस्तक देने
आज तक हमने जिसे पास बुलाया भी नहीं
सुन लिया कैसे ख़ुदा जाने ज़माने भर ने
वो फ़साना जो कभी हमने सुनाया भी नहीं
तुम तो शायर हो "क़तील" और वो इक आम सा शख़्स उसने चाहा भी तुझे और जताया भी नहीं

..................................................... "क़तील शिफ़ाई" 

Friday, 26 November 2010

मैं तन्हा था..

मैं तन्हा था, मंजिल मंजिल भटक रहा था....
तन्हाई का बोझ उठाये...
दिल में अपना दर्द छुपाये...

मैं तन्हा था..

यूँ ही एक दिन चलते चलते..
हुस्न का जलवा सामने आया...
बेहद रंगीन, बेहद सादा.....
साँसों में उसकी अजब सी खुशबू...
उस में था कुछ ऐसा जादू...
यूँ मेरे एहसास पे छाया..
उसकी नजर से रोशनी लेकर..
मैंने अपना सहर सजाया...
मैंने उसे अपना महबूब बनाया.....
मैंने उसमे क्या कुछ देखा....
मैंने उसमे सब कुछ पाया...
गायब हुयी तन्हाई इस दिल से...
नयी उमंग इसमें छायी....
मिली गयी एक नयी जिन्दगी...
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